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राठौड़ वंश के राव सीहा खेड़ विजय राठौड़ों की कुलदेवी और धूह Rao Siha Khed Vijay of Rathod dynasty, Kuldevi and Dhuhad of Rathore Rathod-vansh-rao-siha-khed-nagana-kulsevi-raodhuhad

 

Rao Siha Khed Vijay of Rathod dynasty, Kuldevi and Dhuhad of Rathore Rathod-vansh-rao-siha-khed-nagana-kulsevi-raodhuhad

Rao Siha Khed Vijay of Rathod dynasty, Kuldevi and Dhuhad of Rathore Rathod-vansh-rao-siha-khed-nagana-kulsevi-raodhuhad

 राठौड़ वंश के राव सीहा खेड़ विजय राठौड़ों की कुलदेवी की स्थापना और राव धूहड़ जी के बारे में आपको इस लेख में बताने का प्रयत्न किया जा रहा है!

वैसे इस इतिहास व लेख की प्रमाणिकता के बारे में बता तो यह "आसोप का इतिहास" पुस्तक से मुख्य रूप से लिया गया है! इसके लेखक राव बहादुर ठाकुर फतेह सिंह जी आसोप है!

आसोप ठिकाना मारवाड़ जोधपुर के अंतर्गत आता है यह जोधपुर नगर से उत्तर दिशा में 24-25 कोस की दूरी पर स्थित है इस समय यह ठिकाना कुंपावत राठौड़ो के अधिकार में था

राठौड राजपूत वंश की उत्पत्ति

राठौर अति प्राचीन वंश है! इसका उल्लेख महाभारत ग्रंथ में "आरटृ" नाम से किया गया है!

तत्पश्चात मौर्यवंशी महाराजा अशोक की धर्मग्रंथों में इस वंश का उल्लेख "रास्टिक" शब्द से है! जिस अशोक का राज्य-काल ईशा से पूर्व २५० वर्ष के लगभग माना जाता है!

तत्पश्चात भारतवर्ष के दक्षिण भाग संबंधी दान पात्रों व शिलालेखों में "राष्ट्रकूट" शब्द का प्रयोग देखने में आता है! दक्षिण में राष्ट्रकूटों का राज्य विक्रम की पांचवी छठी शताब्दी में और उसके पश्चात फिर नवमी शताब्दी में होना पाया जाता है!

"राष्ट्रकूट" शब्द का अपभ्रंश राठोड़ शब्द है! इसकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई प्रथम प्राकृत भाषा में "राष्ट्रकूट" का "राट्टऊड़" बन गया!

तत्पश्चात '' और '' की संधि होकर राठोड़ ऐसा प्रचलित हुआ, जो इस समय सभी जगह प्रचलित है!

राठौड़ वंश का वेद - यजुर्वेद, शाखा - अकूर, त्रि- प्रवर, गोत्र - गौतम और कुलदेवी नागणेची है इसी नागणेशी देवी का नाम प्रथम राष्ट्रश्येना और चक्रेश्र्वरी भी था चक्रेश्र्वरी देवी कन्नौज से लाई गई थी!

विक्रम सं. की छठी शताब्दी में कन्नौज पर राठौड़ों का अधिकार था! और फिर उसके बाद 12वीं शताब्दी में प्रबल राज्य हुआ!

इससे पहले कन्नौज पर पड़िहारों का शासन था! राठौड़ चंद्रदेव ने उनको परास्त करके कन्नौज का राज्य विक्रम संवत ११३५ के आस-पास छीन लिया!

जिसके वंश में महाराजा जयचंद्र महा प्रतापी राजा हुआ, उस जयचंद्र को मारकर शहाबुद्दीन गोरी ने विक्रम संवत १२५० में कन्नौज पर अपना अधिकार कर लिया!

तब जय चंद्र के वंशज इधर उधर भाग निकले जिनमें से जयचंद्र का प्रपौत्र राव सीहा विक्रम संवत १२६० के लगभग मारवाड़ की तरफ चला आया!

राठौड वंश के रा सीहा

कन्नौज प्रांत से मारवाड़ की तरफ आते राव सीहा ने पुष्कर तीर्थ में दर्शन करने के लिए अपना पड़ाव किया! और तीर्थ स्नान करके दान पुण्य किया! उनके के साथ पांच सौ अश्व सवार सैनिक भी थे!

उसी समय भीनमाल से ब्राह्मण वहां पर तीर्थ यात्रा के लिए आऐ हुए थे! जिन्हें पहाड़ी जातियां मेर,  भील आदि सताते थे! उन्होंने राव सीहा को वीर पुरुष के रूप में देखा, तो उन्होंने अपनी समस्या बताई और कहा कि हम "ब्राह्मण हैं, और आप क्षत्रिय वीर हैं! गौ,  ब्राह्मण की रक्षा करना आपका धर्म है! हे वीर हमारी रक्षा करें!

तब राव सीहा उनके साथ भीनमाल गए और मेर आदि लुटेरों को मारकर ब्राह्मणों की रक्षा की!

उस समय का यह प्रचलित दुआ है -

"भीनमाल लीधी भडै़, सीहै सेल बजाय,

दत दीधौ सत संग्रहौं, ओ जस कदे न जाय !!

वहां से द्वारका गये, द्वारका से वापिस आते समय पाटन में ठहर कर चावड़ी और सोलंकणी से विवाह कर पाली आये!

पाली उस समय पल्लीवाल ब्राह्मणों की थी! ग्रासिये, मीणे, मेर आदि इनको पीड़ित करते थे! उन्होंने राव सीहा से प्रार्थना की कि हुजूर इन लोगों से हमारी रक्षा करें!

पल्लीवालो ने लाग-भाग देकर राव सीहा को राजी किया और पाली में रोक लिया!

कुछ समय बाद वहां पर मुसलमानी सेना गुजरात की तरफ जाती हुई आई, और उसने पाली को लूट लिया!

राव सीहा उस समय खेड़ (वर्तमान में बालोतरा के पास एक पुरातन नगर) की तरफ गये हुए थे! राव सीहा को पाली लूटने की खबर मिलते ही तुरंत पाली की तरफ निकले!

मुसलमानी सेना और राव सीहा के बीच जबरदस्त मुठभेड़ हुई! बहुत से मुसलमान राव सिहा के हाथ मारे गए! परंतु अंततः वह भी इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए! यह घटना विक्रम संवत १३३० में हुई थी!

राव आसथान

राव सीहा के उपरांत उसका जेष्ठ पुत्र आसथान पदाधिकारी हुये! यह भी अपने पिता की तरह पाली में निवास करते और ब्राह्मणों की रक्षा करते रहे!

परंतु वीर पुरुष परतंत्र में रहना बिल्कुल पसंद नहीं करते! एवं इस प्रकार निवास करना अनुचित समझकर इनके मन में खेड़ का राज्य लेने की अभिलाषा उत्पन्न हुई!

इस राज्य को लेने के लिए राव सीहा ने प्रथम प्रयास भी किया था! परंतु ले नहीं पाए!

इस समय खेड़ पर गोहिल राजपूतों का शासन था! कल्याण सिंह का पुत्र प्रताप सिंह शासक था! डाभी राजपूत मंत्रिमंडल का कार्य देखते थे! जब मंत्री वर्ग बलशाली हो जाते है! तब राजा और मंत्री वर्ग में वैमनस्य हो ही जाता है! मंत्री वर्ग अपनी मनमानी नहीं चला सकते जब राजा अपनी इच्छानुसार कार्य करता है, तब

डाभी मंत्री ने विचार किया कि यह राजा, अब अपने काबू से बाहर निकलता जा रहा है! इसलिए इसके स्थान पर किसी दूसरे को लाकर स्थापित कर देते हैं! वह अपना लाया हुआ होने से अपने वश में रहेगा! इस विचार से उन्होंने राव आसथान से बातचीत की

वह जानता था! कि पहले से राव सीहा इस राज्य पर दांत लगाये हुए था! वह तो इस दुनिया में अब नहीं है, पर उसका पुत्र राव आसथान वैसा ही महाबली वीर और साहसी पुरुष है!

वह अपने पिता की इच्छा पूर्ण कर सकता है! ऐसा अनुसंधान करके डाभी मंत्री राव आसथान से मिले और गोहिल राजा को मारकर खेड़ का राज्य दिलाने की सलाह दी!

राव आसथान मन में अत्यंत प्रसन्न हुए, क्योंकि वह तो यह चाहता ही था! राव ने डाभी से कहा कि इस कार्य को किस प्रकार संपादित कर सकते हैं!

तब डाभी ने कहा कि आपको हम विवाह के बहाने बुलाएंगे! आप बाराती बनकर आ जाना!

वहां उत्सव के समय ऐसी व्यवस्था की जाएगी कि हम अलग बैठ जाएंगे और गोहिल अलग पंक्ति में रहेंगे! हम सभी लोग बाई तरफ और गोहिल दाहिनी तरफ रहेंगे इस विषय की प्राचीन कहावत है, "डाभी डावा नै गोयल जींवाणा'

हम आपको संकेत कर देंगे आप उन्हें मार कर अपना अधिकार कर ले फिर वैसाही किया गया!

गोहिल मारे गए और राठौड़ों का खेड पर अधिकार हो गया! राठौड़ों ने डाभियो को भी मार डाला, क्योंकि ऐसे राष्ट्र द्रोहियों को मारना ही उचित था!

जब खेड पर राठौड़ों का पूर्ण अधिकार हो गया! तब जो कोई गोहिल बच गए थे, वे मारवाड़ छोड़कर भावनगर, पालीताण आदि की तरफ चले गए!

खेड़ पर राव आसथान का अधिकार हो जाने के बावजूद भी अधिकतर वह पाली में ही रहा करते थे!

एक समय रहा चलती बादशहा फिरोजशाह द्धितीय की मुसलमानी सेना पाली की और आई उसने लूटपाट की, तब उसके मुकाबले राव आसथान गये!

और दोनों में घमासान युद्ध हुआ! जिसमें बहुत से तुर्क आसथान के हाथ मारे गए यद्यपि शाही सेना बहुत अधिक थी! तब भी राव ने अपने बाहुबल से उनके नाक में दम कर दिया!

 परंतु राव वहीं पर रण शय्यशायी हो गए! यह घटना विक्रम संवत १३४६ मे हुई थी! रोदावाव के निकट राव आसथान का चबूतरा बना हुआ है!

राव धुहड़

राव आसथान के उपरांत उसका जेष्ठ पुत्र राव धूहड़ खेड़ का शासक बना, उन्होंने अपने बाहुबल से खेड़ के सीमावर्ती १४० गांवों पर अपना अधिकार करके खेड़ के राज्य को विस्तृत कर दिया!

राव धूहड़ के समय राठौड़ों की कुलदेवी चक्रेश्वरी कन्नौज से लाई गई थी - कन्नौज का निवासी सारस्वत ब्राह्मण लुंब ऋषि ओझा ल्होंड़, मारवाड़ में राव सीहा के वंशजों का राज्य सुनकर राठौड़ों की कुलदेवी चक्रेश्वरी की मूर्ति लेकर राव के पास आया!

और राव से निवेदन किया कि "महाराज ! मैं आप की कुलदेवी की मूर्ति कन्नौज से लाया हूं" राव ने उसका स्वागत करके मूर्ति को रख लिया!

देवी ने राव को सपने में नाग के रूप में दर्शन दिया और कहा कि "मुझे तुम यहां स्थापित कर दो"

राव ने देवी की आज्ञा अनुसार वहीं मंदिर बनवा कर देवी की मूर्ति स्थापित की और उसका नाम नागणेशी रखा!

क्योंकि राव को सपने में नाग के रूप में दर्शन दिया था! यह मंदिर इस समय कल्याणपुर नगर के नागाणा गांव में विद्यमान है!

जिस समय लुम्ब ऋषि मूर्ति लेकर आए थे! उस समय राव धूहड़ का निवास गांव नागाणा में ही था! इसलिए वह मूर्ति वहीं स्थापित की गई!

राव धूहड़ ने 140 गांव दबाकर खेड़ राज्य में मिला लिए थे! जिनमें से अधिकतर पड़िहारो के थे! इसलिए धूहड़ पर पड़िहारो ने आक्रमण कर दिया!

राव धूहड़ भी उन्हेंसे मुकाबला करने गया! गांव तींगड़ी में दोनों की मुठभेड़ हुई और घोर युद्ध हुआ जिसमें राव धूहड़ वीरगति को प्राप्त हुए!

गांव तींगड़ी कल्याणपुर से सात आठ किलोमीटर दूर पचपदरा परगना में स्थित है! वहां राव धूहड़ का शिलालेख विक्रम संवत १३६६ का मिला है! आज भी इस गांव में राव धूहड़ का चबूतरा बना हुआ है!

आगे इनकी शाखाएं इस प्रकार हुई

राव रायपाल

राव कनपाल

राव जालणसी

राव छोडो

राव तीडो

राव सलखो

राव वीरम

राव चुंडा

राव रणमल

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